वरण भात
वरण भात
कुछ स्वाद होते हैं, कुछ खुशबुएँ, कुछ बातें, कुछ यादें
याद नहीं आता क्या था
पर उसे खो देना अब भी खटकता है
यह कहानी एक ऐसे ही स्वाद की
ऐसा भी नहीं कि यह किसी राजा महाराजा की रसोई का पकवान था
और न ही कोई महँगा बासमती चावल
यह एक आँगन था
बड़ा सा, खुला सा
जहाँ हर चीज़ अपने मूल स्वभाव में थी
मैं अपनी दादी की बात कर रहा हूँ
उन्हें गए आज पाँच साल हो चुके हैं
हमारा बहुत बड़ा परिवार था
बच्चे, उनके बच्चे, और फिर उनके भी बच्चे
शादी हुई होगी तो मुश्किल से पंद्रह सोलह साल की रही होंगी
वह बताती थीं
जहाँ आज शहर के बीच हमारा घर है
वहाँ कभी खेत हुआ करते थे
जंगली जानवर आस-पास घूमते थे
रात को गली के दरवाज़े पर आग जलानी पड़ती थी
जब से मुझे याद है
बाज़ार से बहुत कम चीज़ें आती थीं
अनाज अपने खेत का
घर में गायें
दूध, दही, घी , सब अपना
सुबह पाँच बजे आवाज़ आती थी
और समझ आ जाता था
दादी उठ गई हैं
पहले गौशाला
फिर दादा की चाय
फिर पूजा
और फिर दोपहर का खाना
इतवार को जब स्कूल नहीं होता
मैं उनके पास जा बैठता
अगर पूजा कर रही होतीं
तो चंदन की लकड़ी का टुकड़ा देतीं
“इसे घिसो”
मैं घिसता रहता
और कुछ ही देर में तिलक तैयार हो जाता
दोपहर को माँ बुलाती
पर मैं गली में दोस्तों के साथ खेलता रहता
और जब माँ के हाथ के खाने में मन नहीं लगता
तो सीधा दादी के पास चला जाता
एक साधारण सा वरण भात
कैसे मन और आत्मा को तृप्ति दे सकता है
यह केवल मेरी दादी के हाथ का खाकर ही समझा जा सकता है
उनकी रसोई अजीब थी
कभी खाना खत्म नहीं होता था
मोहल्ले के लोग
बाबा, फकीर, बच्चे
न जाने कितने लोग
वहाँ बैठकर ,वरण भात खाते थे
शायद ही कभी मैंने
अकेले खाना खाया हो
फिर धीरे-धीरे
घर छोटा पड़ने लगा
या शायद ज़रूरतें बढ़ गईं
एक दिन पता चला
पापा ने थोड़ा दूर एक कॉलोनी में घर ले लिया है
स्कूल पास होगा
लोग ऑफिस वाले होंगे
भविष्य के लिए बेहतर होगा
शायद सही ही था
एक ट्रैक्टर में सामान लदा
और बिना समझे ही
मैं एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आ गया
पहले हर दो दिन में
पुराने घर चला जाता था
फिर यह हफ्तों में बदला
और धीरे-धीरे महीनों में
नए दोस्त बने
दिनचर्या बदल गई
और ज़िंदगी
अपने ही संघर्षों में उलझ गई
अब दादा-दादी से मिलना
सिर्फ त्योहारों तक रह गया
फिर पढ़ाई
फिर नौकरी
और एक दिन
शहर भी बदल गया
हाँ, इतना ज़रूर था
दादी के पास मोबाइल आ गया था
पर न वह ठीक से कॉल कर पाती थीं
न ही उठा पाती थीं
कोई न कोई
मदद कर देता था
लगभग बीस साल से जानता था उन्हें
थोड़ी गुस्से वाली थीं
पर उम्र के साथ
नरम पड़ती जा रही थीं
जब पहली नौकरी लगी
और मैं घर आया
तो मोहल्ले के लोगों को बड़े गर्व से बताती थीं
“तीस हज़ार मिलते हैं”
उनके पास बैठकर
एक अजीब सा सुकून मिलता था
जैसे ठंड के दिनों में
गरम रजाई
अब उम्र बढ़ चुकी थी
घुटनों में दर्द रहता
चलना मुश्किल हो गया था
गायें भी
धीरे-धीरे कम हो गई थीं
पर एक चीज़
कभी नहीं बदली
उनके हाथ का वरण भात
और फिर
एक दिन
वह भी बंद हो गया
आज उन्हें गए
पाँच साल हो चुके हैं
स्वाद स्मृति से धुंधला गया है
पर मेरी आत्मा
अब भी वही माँगती है
मैं वरण भात नहीं
उसमें बसी
एक पूरी उम्र ढूँढता हूँ

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